हर अष्टमी एवं चौदस को आप स्थानक में पहुंचने की आदत डालें।
जिस तरह ईसाई रविवार को चर्च जरूर जाता है। और मुसलमान शुक्रवार को मस्जिद जरूर जाता है।
हमें भी यह दोनों दिन तय करने पड़ेंगे धर्म और त्याग का दिवस शक्ति का दिवस जिनेन्द्र भगवान का दिवस।
आप सभी को शिकायत होती है कि जैन कभी जैन के लिए खड़ा नहीं होता। कैसे होगा क्या आपने ऐसा कोई नियम बना रखा है जिसमें आप कम से कम सप्ताह में एक बार एक दूसरे से मिले। आइए हम अपने वीरान पड़े स्थानक को शक्ति और संगठन स्थल के रूप में विकसित करें।
हर अष्टमी एवं चौदस की सुबह 9:30 से 10:30 के बीच आप चाहे कहीं भी है स्थानक अवश्य पहुंचे, प्रवचन का समय यही होता है।
आप अपने घर पर हैं तो घर के पास के स्थानक में, दुकान पर है तो दुकान के पास के स्थानक में, ऑफिस में है तो ऑफिस के पास किसी स्थानक में पहुंचे, अगर आप यात्रा पर भी हैं तो आप जहां भी हैं वहां पर आसपास किसी भी स्थानक में हर अष्टमी एवं चौदस को सुबह 9:30 से 10:30 के बीच जरूर पहुंचे या अपने समयानुसार एक साथ धर्माराधना अवश्य करें।
कल्पना कीजिए भारतवर्ष में लाखों लाखों मंदिर स्थानक है अगर हर स्थानक में सिर्फ 50 से 100 लोग भी पहुंचेंगे और एक साथ प्रवचन सुनेंगे व नमस्कार सूत्र के आवाज की गूंज आएगी तो एक मिश्रित संगीत जब पूरे भारतवर्ष में हर अष्टमी एवं चौदस को गूंजेगा तो यह आवाज पूरी दुनिया में जाएगी, इसका असर बहुत ही दूरगामी होगा।
विश्वास कीजिए आज की सभी समस्याएं कपूर की तरह उड़ जाएगी इतनी बड़ी संख्या में जब जैन अपने स्थानक में पहुंचेगा वह भी हर सप्ताह तो किसी माई के लाल में हिम्मत नहीं होगी कि जैन को छेड़ सके।
आप अपने साथ अपनी धर्मसहायिका धर्मपत्नी ए्वं बच्चों को मित्रों को भी लेकर स्थानक जाए।
जब आप इस तरह से नियमित रूप से हर सप्ताह स्थानक पहुंचेंगे तो वहां आपके आस पड़ोस में जो लोग हैं वह भी आपसे मिलेंगे आपकी जान पहचान बढ़ेगी आपस में संबंध बढ़ेंगे और फिर आप एक दूसरे के सुख दुख में भी शामिल होंगे इसी तरह से हम सभी एकता के सूत्र में बंध जाएंगे।
और आज ही प्रण करें चाहे हम कुछ भी कर रहे हैं हर अष्टमी चौदस को प्रवचन सुनने स्थानक जरूर पहुंचेंगे अपने समाज, अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए। ध्यान रहे अब यह आवश्यक हो चुका है अगर आप इसे अभी भी टालते रहे तो बहुत बड़े खतरे में आप पडने वाले हैं। जितना शीघ्र आप इसे शुरू करेंगे इतना जल्दी आप एक दूसरे से एकता के सूत्र में बंध जाएंगे।
श्री महावीराय नम: